माँ ने दूध का गिलास मुह से लगाया था की दादी हॉस्पिटल की बातें करने लगी, एक पल के लिए तो मैं और माँ दोनों ही डर गए थे लेकिन जैसे ही दादी ने कहा की तू इतनी कमजोर है की डाक्टर साहब ने तेरा वह वाला टेस्ट ही नहीं किया जीसस यह पता चलता है की तेरे पेट में लड़का है या लड़की, यह सुनकर हम लोगो की जान में जान आई। माँ सोचने लगी की आखिर यह बात मैं कब तक छुपा कर रख सकती हूँ सच्चाई तो सामने आनी ही इसलिए क्यों न सचाई को धीरे धीरे माता जी के सामने लाया जाय। हलाकि माँ पूरी तरह से यह नहीं जानती थी की उनके पेट में लड़की ही है, लेकिन पता नहीं कैसे उन्हें मेरे होने का अहसास था। सो वह डरती थी की अगर सच में लड़की ही हुई तो क्या होगा, इसलिए वह चाहती थी की माता जी को यह बताना बहुत जरुरी है की कुछ भी हो सकता है, माँ ने धीरे से कहा की माताजी मैं भी चाहती हूँ की मेरे पेट में आपके खानदान का वारिस ही जन्म ले , लेकिन अगर लड़की हुई तो? यह सुनकर माता जी ने माँ को जोर से डाटते हुए कहा की तू पागल तो नहीं है कैसे लड़की होगी, हमारे खानदान में हर बहु के पहला बच्चा लड़का ही हुआ है तो फिर बरसो से चली आ रही यह परंपरा कैसे बदल सकती है, इसलिए तू ऐसा अशुभ बोलना तो दूर की बात सोचना भी नहीं। दादी के बात सुन कर तो माँ सन्न रह गयी, उसे समझ ही नहीं आ रहा था की आखिर कैसे दादी को समझे की लड़का या लड़की पैदा करना माँ के हाथ में नहीं होता, डरते हुए फिर बोली माता जी वैसे लड़का या लड़की पैदा करना किसके हाथ में होता है, दादी ने कहा की अगर बहु घर की लक्ष्मी होती है और उसमे अच्छे संस्कार होते है तो उससे लड़का ही होता है और अगर उसने को पाप किया होता है तो उस पाप का फल के रूप में ही लड़की जन्म लेती है, तुने सुना नहीं है जब किसी के लड़की होती है तो सब यह ही कहते है की पता नहीं क्या पाप किया था जो घर में लड़की ने जन्म लिया, माँ ने धीमे आवाज में कहा की माँ लड़की को तो साक्षात् लक्ष्मी और देवी का रूप मानते है, अगर घर में लड़की आ जाय तो कहते है की घर में लड़की आ गयी, दादी ने कहा की लक्ष्मी बहुए होती है बेटी तो पराया धन होती है, इसलिए जब पराया है तो कहा अपना रहा इसलिए तुझे नहीं मालुम की बेटी होने पर पूरी बिरादरी में सर झुक जाता है उप्पर से बेटी कोई उच्च नीच कर बैठे तो समझो समाज में मुंह तक दिखाना मुश्किल हो जाता है , माँ ने कहा की माता जी उच्च नीच तो लड़के से भी हो सकती है, तो दादी झुन्झुलाते हुए बोली की लड़के के सो जुर्म भी माफ़ होते है और वैसे भी लडको को बच्चा नहीं ठहरता , बच्चा तो लड़की यह ठहरता है इसलिए अब तू ऐसे समय पर यह फ़ालतू की बातें मत सोच , तू सिर्फ आराम कर बस। यह बोलकर दादी कमरे से बाहर चली गयी और माँ फिर से बिस्तर पर लेट गयी, माँ का शरीर तो आराम कर रहा था लेकिन माँ का मन और दिमाग अभी भी इसी उलझन में था की आगे न जाने क्या होने वाला है, माँ बस चुप चाप पडी हुई थी, माँ को इतना परेशान देख कर मैं भी बहुत परेशान थी, माँ की मदद करना चाहती थी लेकिन कुछ कर नहीं पा रही थी, ....शेष अगले एपीसोड़े में
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Friday, 4 February 2011
Saturday, 25 September 2010
एक लड़की की कहानी एपिसोड- 9
माँ यह सोच ही रही थी की कही माता जी ने मेरा चेकअप तो नहीं करा दिया इतने में हम घर पहुच गए और दादी ने रिक्शेवाले से कहा की भैया रिक्शा जरा दरवाजे पर लगा दे ताकि मेरी बहु आसानी से उतर सके, दादी के मन में माँ के लिए इतनी चिंता और प्यार देख कर लगता तो बहुत अच्छा था लेकिन यह सोच कर दुःख भी लगता था की सच का पता चलने पर दादी माँ के साथ न जाने कैसा बर्ताव करेगी, दादी ने माँ को रिक्शे से उतरने में मदद की और घर के भीतर ले जा कर माँ को उनके पलंग पर लिटा आई, और तब बाहर जाकर रिक्शेवाले को पैसे दिए, और रिक्शेवाले को सफाई देते हुए कहा की भैया जरा माफ़ करना तुम्हे इन्तजार करना पड़ा वो जरा बहु को इतनी देर खड़ी रखकर तुम्हे पैसे देती तो कही वो दुबारा बेहोश न हो जाती, बहुत कम्जूर हो गयी है न इसलिए। रिक्शेवाले ने बड़ी उदारता से कहा कोई बात नहीं माताजी, माँ को होश आ चुका था लेकिन माँ जान बुझ कर अपनी आँखों को बंद किये लेटी थी की कही चेकअप में असलियत न आ गयी हो, लेकिन माँ को क्या पता की माँ का चेकअप हुआ ही नहीं, दादी माँ से कुछ बात करती की देखा की बहु की आँखे बंद है लगता है आराम कर रही है सो बिना जगाय ही अपने कमरे में चली गयी। दादी के कमरे से बाहर जाते ही माँ ने धीरे धीरे अपनी आँखे खोली और भगवान् से बात करने लगी, "हे भगवान् यह तुने क्या किया, मैं जिस बात को छुपा रही थी आज वह बात माताजी के सामने इस तरह से सामने आ गयी, उन्हें कितनी तकलीफ हुई होगी, अब मैं क्या करू? " फिर अचानक माँ ने सोचा की अगर माताजी ने चेकअप करवाया होता तो माता जी कुछ तो कहती लेकिन उन्होंने अभी तक कुछ भी क्यों नहीं कहा? कही वह बहुत ज्यादा गुस्से में तो नहीं है? कही शाम को अपने बेटे के सामने तो सारी बात नहीं करना चाहती? माँ यह सोचती रही और अन्दर ही अन्दर रात को होने वाले कलेश की पूर्व कल्पना करती रही, और भगवान् से कामना करती रही की भगवान् सब आपके ही हाथ में है, कृपा सब ठीक रखना। देखते ही देखते आँगन से धुप सिमटी गयी और संध्या बिखरती जा रही थी, दादी को लगा की दोपहर से बिना कुछ खाय पिए मेरी बहु ऐसे ही पड़ी हुई है चलूं देखूं उसकी तबियत कैसी है? दादी माँ के पास आई और सिराहने बैठ गयी और माथे पर हाथ फेरते हुए बोली अब कैसे तबियत है तेरी? माँ ने धीरे से कहा अब ठीक है माताजी । दादी ने कहा की बेटी अब तू बस आराम कर और सब भूल जा तू बहुत कमजोर हो गयी है इसीलिए बार बार चक्कर आ रहा है। तू बता की तेरे लिए कुछ खाने को बना लाऊ? तुने दोपहर से कुछ नहीं खाया, माँ ने कहा की नहीं माँ अभी कुछ खाने का मन नहीं कर रहा, दादी ने कहा की मैं जानती हूँ की ऐसे में कुछ भी खाने पिने को मन नहीं करता लेकिन फिर भी मन मार कर खाना ही पड़ता है । तू अपने साथ साथ होने वाले बच्चे को भूखा क्यों मार रही है? इसलिए तू आराम कर मैं कुछ लाती हूँ, यह बोल कर दादी रसोई में गयी और माँ के लिए दूध और साथ में कुछ बिस्कुट ले आई और माँ को कहा की अब तू बिना मुह बनाय इसे ख़तम कर। माँ ने हाथ में जैसे ही गिलास लिया इतने में दादी के मुह से एक ऐसी बात निकली जिसे सुनकर मेरी और माँ दोनों की धड़कन ही रुक गयी....शेष अगले अंक में....
Monday, 7 June 2010
एक लड़की की कहानी एपिसोड- 8
दादी ने कहा की मैं सोच रही हूँ की क्यों न तू भी जांच करा ले? दादी के बस यह कहने की देर थी की माँ की दिल की धड़कन पहले से और ज्यादा तेज धड़कने लगी और माँ बेहोश हो गयी। माँ के बेहोश होते ही दादी भाग कर साथ के कमरे में बैठे डॉक्टर को अपने साथ बुला लाइ, डॉक्टर साहब ने अपने आला लगाया और एक दम बोले की क्या हुआ आपकी बहु की दिल की धड़कन तो बहुत ज्यादा तेज है, क्या आप इन्हें पैदल लाइ है? क्या यह अभी अभी सीडीयाँ चढ़ कर आई है? दादी ने कहा नहीं डॉक्टर साहब न तो मैं इससे पैदल लाइ हूँ और न ही यह अभी अभी सीडीयाँ चढ़ कर आई है, बल्कि हम तो यंहा पिछले २ घंटे से लाइन में बैठे है, डॉक्टर बोला की फिर क्या आपने अपने बहु को डाटा है? मानो या मानो आपकी बहु दिमागी तोर पर बहुत परेशान है जिस वजह से इससे यह चक्कर आया, डॉक्टर के ऐसा कहने पर दादी तुरंत बोली हा डॉक्टर साहब यह आज घर पर भी बेहोश हो गयी थी इसीलिए मैं इससे आज यंहा लाइ हूँ, और रही बात चिंता की तोह मेरी तरफ से मेरी बहु को कोई चिंता नहीं हो सकती , मैं तो इससे अपनी बेटी की तरह मानती हूँ, इसका इतना ध्यान रखती हूँ, जब से मुझे पता चला है की मेरी बहु मेरे घर को चिराग देने वाली है, हमारे खानदान का नाम चलाने वाला आना वाला है तब से तो मैं इससे कुछ काम भी करने नहीं देती, दादी के यह सब बोलने से डॉक्टर शायद माँ की चिंता का कारन समाग गया और दादी से बोला की माता जी आपको कैसे पता की आपकी बहु आपको पोता ही देने वाली है? क्या आपने कही चेक अप करवाया है? दादी ने कहा वैसे तो हमारा खानदान में बरसो से यह परंपरा ही चली आई है की हमारा यंहा हर बहु की पहली बार बेटा ही पैदा हुआ है, इसलिए मुझे पूरा भरोसा है की मेरी बहु यह परंपरा नहीं तोड़ेगी, दुसरे आज मैं इसका चेक अप भी करवाने की सोच रही थी लेकिन जैसे ही मैंने इससे चेकअप करवाने के लिया पुचा वैसे ही यह बेहोश हो गयी। डॉक्टर को यकीन हो गया की जो वोह सोच रहा था वही बात है, इसलिए डॉक्टर ने दादी को समझाया की देखिये माताजी आपकी बहु बहुत ज्यादा कमजोर है इसलिए यह बार बार बेहोश हो जाती है और अगर में ऐसे में आप चेकअप भी करवाती है और चेकअप में कोई गड़बड़ हो जाती है तो उससे होने वाले बच्चे को नुक्सान हो सकता है, इसलिए बेहतर होगा की आप इससे घर ले जाए और पूरा पूरा आराम करने दें, मैं कुछ ताकत की दवाई और सीरफ लिख देता हूँ, आप उन्हें पिलाई और अपनी बहु का ध्यान रखिये, दादी ने कहा की हा हा आप बिलकुल ठीक कह रहे है मैं भी किस पागल ओरत की बातो में आ गयी और चेकअप करने के बारे में सोचने लगी, हमे तो चेकअप करवाने की जरुरत ही नहीं हमारी तो परंपरा में ही लड़का है तो हम क्यों इन मशीनों पर भरोसा करे, दादी ने डॉक्टर साहब से दवाइयों का परचा लिया और माँ को घर ले आई, रास्ते में बहार की ताज़ी हवा लगने से माँ होश में तो आ गयी लेकिन दादी से बोली नहीं और अन्दर ही अन्दर सोचने लगी की लगता है माता जी ने मेरा चेकअप करा ही दिया, (शेष अगले एपिसोड में )
Wednesday, 24 March 2010
एक लड़की की कहानी एपिसोड (7)
मुझे और माँ को लगा की कही दादी माँ की भी इस तरह का कोई टेस्ट न करने को कहे? जैसे जैसे हमारा नंबर आ रहा था वैसे वैसे माँ और मेरी हालत डर के मारे खराब हो रही थी, दादी ने उस ओरतसे पूछा की अच्छा यंहा डॉक्टर यह भी बता देंगे की garbhvati महिला के पेट में लड़का है या लड़की? उस ओरत ने बड़ी ही उत्तेजित आवाज में कहा हाँ-हाँ बिलकुल, क्या तुम भी अपनी बहु का यह ही पता कराने आई हो? दादी ने कहा नहीं, यह गिर गयी थी सो मैंने सोचा की एक बार डॉक्टर साहब को दिखा लूँ की सब कुछ ठीक तो है कहीं बच्चे को कोई चोट तो नहीं आई, यही दिखाने आई हूँ। उस ओरत ने बड़ी ही ठंडी आवाज में उत्तर दिया अच्छा, मुझे लगा की आप भी लड़का या लड़की की जांच करवाने है, लगता है आपने पहले कही से जांच करा ली होगी, और जांच में लड़का ही बताया होगा, तभी आपको इतनी चिंता हो रही है, उस टाइम मेरी दादी ने थोडा समझदारी भरा जवाब दिया की अरे बहन क्या बात कर रही हो, लड़का हो या लड़की अगर बहु गिर जायेगी तो चिंता तो होगी न, वैसे अभी मैंने अपनी बहु की कही भी जांच नहीं काराई। और ओरत ने कहा की अरे जब आई हो तो यह काम भी करा ही लो दोनों काम एक साथ हो जायेंगे, अगर लड़का होगा तो यंहा से खुशु बटोरती हुई जाना और हाँ मुझे भी मिठाई खिलाना और अगर लड़की हुई तो यही पर रफा दफा करना, मैं भी यही सोच कर अपनी बेटी को लाइ हूँ, क्यूंकि अगर लड़की हुई तो मेरी बेटी की जेठानी उसे ताने मारेगी और सास भी मेरी बेटी से ज्यादा उसकी जेठानी को प्यार करेगी क्यूंकि उसके बेटा है। इसलिए मैं नहीं चाहती की कोई मेरी बेटी को ताने मरे, इतने में मेरी दादी ने कहा की क्या तुमने इसके ससुराल वालो से इस बात की इज्जाजत ले ली है? उस ओरत ने कहा की नहीं उन्हें नहीं पता, मेरी बेटी ने डर के मारे अभी अपने ससुराल में किसी को नहीं बताया सिर्फ अपने पति और मुझे ही बताया है, और मेरे दामाद भी यही चाहते है की उनकी पत्नी यानि मेरी बेटी को ससुराल में कोई ताने ने मारे इसलिए जांच में अगर लड़की है तो उसे यही रफा दफा कर देंगे और अगर लड़का है तो मेरी बेटी अपनी ससुराल में बता देगी और अपनी सास की मन की होकर रहेगी, उस ओरत और दादी की यह सारी बातें सुनकर मेरी और माँ की जान जा रही थी। दादी उस ओरत से कुछ और भी पूछना चाहती थी की इतने में उस ओरत का नंबर आ गया और वो अन्दर डॉक्टर के पास अपनी बेटी को लेकर चली गयी, दादी अभी शांत बैठी थी और दादी की इस शांति का मतलब मैं न जाने क्या क्या निकल रही थी, मुझे लग रहा था की शायद दादी माँ की भी जांच कराने को न कह दे? माँ ने डरते हुए दादी से पूछा की माताजी क्या हुआ आप क्या सोच रही है? दादी ने कहा की मैं सोच रही हूँ की..........................
Monday, 1 February 2010
एक लड़की कि कहानी, (एपिसोड -6)
माँ बेहोश हो कर गिर पड़ी, दादी को माँ के गिरने के बारे में नहीं पता था, दादी कमरे में बैठी माँ के आने का इन्तजार कर रही थी कि कब माँ आये और कब माँ और दादी एक साथ बैठ कर खाना खाय। मेरी माँ बेहोश पड़ी थी और मैं कुछ नहीं कर पा रही थी, मैं सोच रही थी कि भगवान् दादी को कमरे से बहार भेज दो ताकि वो माँ को बेहोशी की हालत में पड़ा हुआ देख लें, इतने में दादी बडबडाती हुई कमरे से निकली, दादी बड़े गुस्से में बाहर आ रही थी शायद माँ को डाटने के लिए लेकिन जैसे ही उनकी नजर आंगन में पड़ी तो देखा कि उनकी बहु बेहोश पड़ी हुई है, दादी चिल्लाते हुए माँ की ओर दोडी, दादी को इतना परेशान देख कर मुझे यह अहसास तो हो गया कि दादी माँ से बहुत प्यार करती है। दादी
ने माँ को आवाज लगाकर , बारबार लक्लाककर उठाने की कोशिश की , लेकिन माँ होश में नहीं आई , फिर दादी भीतर से लोटे में पानी लेकर आई और माँ के मुंह पर पानी के कुछ छीटे मारे और माँ के मुंह में चम्मच से पानी डाला तो, माँ ने धीरे धीरे अपनी आँखें खोली, दादी ने बड़ी हडबडाहट में माँ से पूछा क्या हो गया था तुझे, अचानक से चक्कर कैसे आ गए, क्या सुबह से तू खाली पेट है? माँ ने धीरे से हां करते हुए सिर हिलाया, दादी ने माँ को डाटते हुए कहा अरे पगली ऐसी हालत में भूखे नहीं रहते , तू अब अकेली नहीं तेरे साथ एक और जान है, इसलिए अब तुझे अपने और इसके दोनों के बदले खाना है, चल-चल जल्दी उठ मैं तेरे लिए कुछ खाने को लाती हूँ, दादी माँ को यह सब सुनाते सुनाते माँ को कमरे में ले आई और माँ को आराम करने को कह कर खुद रसोई में चली गयी, माँ लेटे-लेटे अब भी यही सोच रही थी कि वो दादी को सारी बात कैसे बताये। दादी का इतना प्यार देख कर तो मेरा मन भी दुखी हो रहा था, कि मैं लड़की क्यों हूँ, माँ ने सोचा कि माँ इस बात को दादी को बता कर दादी को बहुत बड़ा दुःख देने वाली है, आने वाले भविष्य के चक्कर में माँ दादी से उनकी अभी की ख़ुशी को भी छीन लेंगी, माँ यह सब सोच ही रही थी कि इतने में दादी माँ के लिए खूब बड़ा दूध का गिलास भर कर ले आई और साथ में कुछ मेवा , और ला कर माँ के आगे रख कर बैठ गयी और कहा की चल मेरे सामने यह सब बैठ कर ख़तम कर, मुझे पता है, तू अकेले में कुछ नहीं खाती है, दादी ने अपने हाथ से माँ को दूध का गिलास दिया और माँ को बड़े प्यार से दूध पीने को कहा, माँ जितने दूध पी रही थी, उतना दादी थी की लगातार बोले ही जा रही, थी, और उनकी बातों से साफ़ लग रहा था कि दादी माँ के बेहोश हो जाने को लेकर बहुत चिंतित है, दादी ने माँ से पूछा , बेटी तुझे कही चोट तो नहीं आई, एक पल को लगा की दादी ने यह बात माँ से नहीं बल्कि मुझसे पूछी है, इसलिए मेरे मुंह से एक दम से निकला की नहीं दादी, लेकिन सच तो यह था कि दादी ने माँ से उनकी चोट के लिए पूछा था, माँ ने भी मना किया लेकिन दादी को विश्वास नहीं हुआ, सो दादी ने कहा कि ऐसा कर तू जल्दी से तैयार हो, एक बार डोक्टर के चले चलते है, वरना मुझे जाते जाते चिंता रहेगी, कही तेरे बच्चे को अन्दर चोट न लग गयी हो, इसलिए तू बस चल, माँ भी दादी के कहने पर मान गयी और चलने को तैयार हो गयी, दादी ने खाना भी नहीं खाया और घर को ताला लगा कर डोक्टर की दुकान पर पहुँच गयी, दादी माँ को काफी बड़े अस्पताल में लाइ थी वंहा बहुत सारी गर्भवती महिलायें इधर से उधर घूम रही थीं, दादी ने माँ को एक जगह बेंच पर बिठा दिया और कहा की तू यंही बैठ मैं अभी आई, दादी ने एक काउंटर पर बैठे आदमी से कहा कि यहाँ सबसे बड़ी लेडी डोक्टर कोन है, उस आदमी ने कहा कि आप कमरा नंबर १६ में चली जाइए, दादी माँ को ले आई, दादी और माँ दोनों १६ नम्बर कमरे के सामने आ कर बैठ गए, काफी लम्बी लाइन लगी थी, मेरी माँ का नम्बर सबसे आखिरी में था, माँ के नंबर से पहले जिसका नम्बर था वो भी सास बहु की तरह ही लग रहे थे। दादी ने बराबर में बैठी महिला से कहा की आप किसके साथ आई है, आपकी बहु है, उस महिला ने कहा की नहीं-नहीं यह मेरी बेटी है, और माँ बनने वाली है, अभी मायके रहने आई है, इसलिए सोचा कि एक बार यह पता कर लूँ की पेट में लड़का है या लड़की, यह सुनते तो माँ और मैं दोनों ही घबरा गए कि कहीं ...............
ने माँ को आवाज लगाकर , बारबार लक्लाककर उठाने की कोशिश की , लेकिन माँ होश में नहीं आई , फिर दादी भीतर से लोटे में पानी लेकर आई और माँ के मुंह पर पानी के कुछ छीटे मारे और माँ के मुंह में चम्मच से पानी डाला तो, माँ ने धीरे धीरे अपनी आँखें खोली, दादी ने बड़ी हडबडाहट में माँ से पूछा क्या हो गया था तुझे, अचानक से चक्कर कैसे आ गए, क्या सुबह से तू खाली पेट है? माँ ने धीरे से हां करते हुए सिर हिलाया, दादी ने माँ को डाटते हुए कहा अरे पगली ऐसी हालत में भूखे नहीं रहते , तू अब अकेली नहीं तेरे साथ एक और जान है, इसलिए अब तुझे अपने और इसके दोनों के बदले खाना है, चल-चल जल्दी उठ मैं तेरे लिए कुछ खाने को लाती हूँ, दादी माँ को यह सब सुनाते सुनाते माँ को कमरे में ले आई और माँ को आराम करने को कह कर खुद रसोई में चली गयी, माँ लेटे-लेटे अब भी यही सोच रही थी कि वो दादी को सारी बात कैसे बताये। दादी का इतना प्यार देख कर तो मेरा मन भी दुखी हो रहा था, कि मैं लड़की क्यों हूँ, माँ ने सोचा कि माँ इस बात को दादी को बता कर दादी को बहुत बड़ा दुःख देने वाली है, आने वाले भविष्य के चक्कर में माँ दादी से उनकी अभी की ख़ुशी को भी छीन लेंगी, माँ यह सब सोच ही रही थी कि इतने में दादी माँ के लिए खूब बड़ा दूध का गिलास भर कर ले आई और साथ में कुछ मेवा , और ला कर माँ के आगे रख कर बैठ गयी और कहा की चल मेरे सामने यह सब बैठ कर ख़तम कर, मुझे पता है, तू अकेले में कुछ नहीं खाती है, दादी ने अपने हाथ से माँ को दूध का गिलास दिया और माँ को बड़े प्यार से दूध पीने को कहा, माँ जितने दूध पी रही थी, उतना दादी थी की लगातार बोले ही जा रही, थी, और उनकी बातों से साफ़ लग रहा था कि दादी माँ के बेहोश हो जाने को लेकर बहुत चिंतित है, दादी ने माँ से पूछा , बेटी तुझे कही चोट तो नहीं आई, एक पल को लगा की दादी ने यह बात माँ से नहीं बल्कि मुझसे पूछी है, इसलिए मेरे मुंह से एक दम से निकला की नहीं दादी, लेकिन सच तो यह था कि दादी ने माँ से उनकी चोट के लिए पूछा था, माँ ने भी मना किया लेकिन दादी को विश्वास नहीं हुआ, सो दादी ने कहा कि ऐसा कर तू जल्दी से तैयार हो, एक बार डोक्टर के चले चलते है, वरना मुझे जाते जाते चिंता रहेगी, कही तेरे बच्चे को अन्दर चोट न लग गयी हो, इसलिए तू बस चल, माँ भी दादी के कहने पर मान गयी और चलने को तैयार हो गयी, दादी ने खाना भी नहीं खाया और घर को ताला लगा कर डोक्टर की दुकान पर पहुँच गयी, दादी माँ को काफी बड़े अस्पताल में लाइ थी वंहा बहुत सारी गर्भवती महिलायें इधर से उधर घूम रही थीं, दादी ने माँ को एक जगह बेंच पर बिठा दिया और कहा की तू यंही बैठ मैं अभी आई, दादी ने एक काउंटर पर बैठे आदमी से कहा कि यहाँ सबसे बड़ी लेडी डोक्टर कोन है, उस आदमी ने कहा कि आप कमरा नंबर १६ में चली जाइए, दादी माँ को ले आई, दादी और माँ दोनों १६ नम्बर कमरे के सामने आ कर बैठ गए, काफी लम्बी लाइन लगी थी, मेरी माँ का नम्बर सबसे आखिरी में था, माँ के नंबर से पहले जिसका नम्बर था वो भी सास बहु की तरह ही लग रहे थे। दादी ने बराबर में बैठी महिला से कहा की आप किसके साथ आई है, आपकी बहु है, उस महिला ने कहा की नहीं-नहीं यह मेरी बेटी है, और माँ बनने वाली है, अभी मायके रहने आई है, इसलिए सोचा कि एक बार यह पता कर लूँ की पेट में लड़का है या लड़की, यह सुनते तो माँ और मैं दोनों ही घबरा गए कि कहीं ...............
Wednesday, 27 January 2010
एक लड़की की कहानी (एपिसोड - 5 )

माँ ने देखा कि दादी अपने संदूक को खोल कर बैठी हुई थी और कुछ-कुछ सामान अलग से निकाल कर रख रही थी, माँ को देख कर दादी ने कहा कि खाना रख दे पहले इधर आ। दादी कि आवाज में बहुत ख़ुशी और उत्सुकता झलक रही थी, माँ ने खाना रख दिया और माँ धीरे धीरे दादी की ओर चलने लगी, दादी ने बड़े ही गुदगुदाते हुए कहा कि देख यह सारा सामान मेरे पोते के लिए है जो मैंने न जाने कब से रखे हुए थे, आखिर आज वो दिन आ ही गया जब मैं इन्हें निकाल रही हूँ, यह बोलते बोलते दादी कि आँखों में ना जाने क्यों आंसूं भर आये, शायद वो ख़ुशी के आंसू थे , दादी अपनी ख़ुशी बयान नहीं कर पा रही थी। दादी ने माँ से कहा देख-देख यह तेरे पति के वोह कपडे है जो उसने अपनी छटी पर पहने थे, मैं चाहती हूँ कि मेरा पोता इस दुनिया में आने के बाद सबसे पहले यह कपडे ही पहने, अब तू यह मत सोचने लगियो कि कैसी दादी है जो अपने पोते के लिए इतने साल पुराने कपडे दे रही है, अरे पगली हाल ही के पैदा हुए बच्चे क़ी खाल बहुत नाजुक होती है और नए कपडे से उसकी नाजुक खाल को नुक्सान पहुंचेगा, इसलिए ५-६ दिन के बालक को पुराने कपडे ही पहनाना , और देख मैंने अपने पोते के लिए सोने की चेन , यह देख हाथ और पैरो के छोटे छोटे खडुए, देख-देख उसकी कमर क़ी कन्होनी , नजर से बचाने के लिए हाय । दादी ने न जाने कब से यह सब सामान जोड़ रखा था, जिसे दिखा दिखा दादी बहुत खुश हो रही थी, माँ भी कहीं न कहीं खुश तो थी यह सोच कर कि दादी को अपने पोते के आने की कितनी ख़ुशी है, काश उनकी यह ख़ुशी पूरी हो जाए, लेकीन माँ इस बात के लिए ज्यादा डर रही थी कि दादी सच का सामना कैसे कर पाएंगी, लेकिन दादी का सारा सामान देख कर मुझे बहुत ज्यादा दुःख हुआ, क्या दादी ने मेरे लिए एक छोटा सा खिलौना भी नहीं ख़रीदा, क्या दादी मुझसे इतनी नफरत करती है, मैं माँ के पेट में ही रो रो कर कराह रही थी, खुल कर इसलिए नहीं रो रही थी कि कहीं मेरी माँ को मेरे रोने का पता न चल जाए, लेकिन माँ तो माँ होती है न, उनसे भला बच्चे कैसे कोई बात छुपा सकते है, माँ ने दादी की बात बीच में ही काट कर कहा कि माताजी खाना बिलकुल ठंडा हो जाएगा, इसलिए पहले खाना खा लीजिये, दादी ने माँ से कहा कि हा हा ठीक है, तू पहले यह सामान अपने बक्से में जाकर रख दे, माँ ने कहा कि हा ठीक है और माँ सामान लेकर अपने बक्से में जाकर रख आई, माँ अन्दर ही अन्दर सोच रही थी कि क्यों न माताजी को मैं अपने मन की बात बता दूँ? यह सोच कर माँ ने फैसला लिया कि माँ दादी को अपने मन की सारी बात बता देंगी, क्यूंकि माँ नहीं चाहती थी कि दादी को बाद में कोई सदमा लगे, माँ यह सोचते सोचते दादी के कमरे कि ओर जा ही रही थी कि अचानक से माँ ..........(शेष अगले एपिसोड में )
Saturday, 16 January 2010
एक लड़की की कहानी एपिसोड -५

पिताजी के सुनो कहते ही माँ एक दम सन्न हो कर पिताजी कि और देखने लगीं , पिताजी अभी कुछ बोले भी न थे कि माँ कि आँखों में आंसूं भर आये , मानो माँ को पहले ही पिताजी के जवाब का अहसास हो गया हो, माँ कि आँखों में आंसूं देखकर मैं समझ गयी कि पिताजी का जवाब क्या होगा? का उत्तर पहले ही , एक आदमी को उसकी जड़ से पहचानने कि ताकत शायद एक स्त्री के अलावा किसी और में नहीं है । माँ में बड़ी भरी हुई आवाज में पिताजी से कहा कि मैं आपके जवाब का इन्तजार कर रही हूँ, पिताजी माँ से बोले कि देखो जहा तक मेरी बात है मुझे तो पिता बनाकर ही तुमने मेरी साड़ी इच्छाए पूरी कर दी है और मुझे इस बात से कोई फर्क भी नहीं पड़ता कि तुम्हारी कोख से लड़की जन्म ले या लकड़ा, मेरे लिए तो दोनों का ही सामान महत्त्व है, क्यूंकि दोनों में ही मेरा अंश होगा, हाँ माँ के लिए तो हमे सोचना हो होगा, वो तो बेचारी अपने पोते का मुंह देखने के लिए ही जिन्दा है, उसे बुदापे में हम इससे ज्यादा बड़ी ख़ुशी और दे भी क्या सकतें है, इसलिए मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी माँ को पोता ही दो। यह सुनकर तो मानो मेरी माँ कि सांस ही थम गयी हो, वह इतनी परेशान हो गयी थी कि पिताजी के आवाज लगाने पर वह नहीं सुन रही थी और वंहा से उठ कर रसोई में जा बैठी, माँ को ऐसी हालत में देखकर मुझे अपने होने का अफ़सोस हो रहा था, मैं सोच रही थी कि काश मैं लड़की से लड़का बन जाऊं और अपनी माँ को ख़ुशी दे सकूँ, लेकिन भला ऐसा कैसे हो सकता है, पिताजी के वो शब्द मेरे कानो में भी गूंज रहे थे, और माँ तो मानो अपने होश में ही नहीं थीं, पिताजी को माँ कि हालत का शायद अंदाजा नहीं था सो वो दफ्तर जाने के लिए तैयार हुए और माँ को खाने का डिब्बा लगाने को कहा, माँ डिब्बा लेकर पिताजी कि देने आई तो पिताजी से माँ को देखा और वह माँ को कमरे में हाँथ पकड़ कर ले गए, पिताजी से जैसे ही माँ से पूछा कि क्या हुआ तुम इतनी परेशान क्यों हों , तो माँ ने पिताजी कि और देखा और चुप कड़ी रहीं, माँ शायद पिताजी से कोई शिकायत करना नहीं चाहती थीं, लेकिन माँ कि आँखों में माँ का दर्द साफ़ दिख रहा था, बस उसे कोई पड़ने वाला ही नहीं था, माँ के कुछ भी न बोलने पर पिताजी ने माँ से कहा कि देखो तुम चिंता मत करो, भगवान् सब अच्छा ही करेंगे, और यह कहकर पिताजी दफ्तर के लिए निकल गए, माँ ने दादी को बुलाया और कहा कि माता जी आप भी चलिए खाना खा लीजिये, दादी ने माँ से कहा कि ठीक है मेरा और अपना दोनों का खाना ले आ दोनों साथ में बैठ कर खायेंगे और बातें भी करतें जायेगे, मुझे कल वापिस गाँव जाना है इसलिए जाने से पहले तुझे सबकुछ समझा दूँ कि गर्भवती स्त्री को कैसे कैसे रहना चाहिए, माँ ने दादी और अपने लिए खाना लगाया और माँ दादी के कमरे में चली गयी, माँ जैसे ही वहां पहुंची तो माँ ने देखा कि दादी .............................(शेष अगले एपिसोड में ) आपको यह कहानी कैसी लग रही है कृपा जरुर बताएं
Monday, 4 January 2010
एक लड़की की कहानी (एपिसोड - ३ )
दादी ने माँ से ऐसा क्या कहा जो माँ रो पड़ी, मैं यह बात लगातार सोचती रही, मैं अन्दर ही अन्दर माँ से पूछ भी रही थी कि ' मेरी प्यारी माँ मुझे तो बताओ कि आपके रोने का क्या कारण है ? ' लेकिन शायाद मेरी आवाज मेरी माँ नहीं सुन पार रही थी, शायद मेरे अलावा माँ को रोते हुए पिताजी या दादी में से किसी ने भी नहीं देखा था। माँ ने चुपचाप से अपने आँचल से अपने आंसू स्वयं ही पोछ लिए और रसोई में जाकर फिर से काम में लग गयी। घर में सभी लोग सो चुके थे ओर माँ पूरी रसोई की सफाई करके सोने के लिए कमरे में आई तो देखा कि पिताजी भी सो चुके थे, एक बार को माँ ने पिताजी को उठाने के लिए उनकी बांह पकड़ी, शायद माँ पिताजी से कोई बात करना चाहती थी, लेकिन माँ ने देखा कि पिताजी बहुत ही गहरी नींद में सो रहे है ओर सोते समय भी पिताजी के चहरे पर एक ख़ुशी झलक रही थी, सो माँ ने पिताजी को नहीं उठाया ओर खुद भी सोने के लिए लेट गयी, माँ सोते हुए भी सो नहीं रही थीं, बार बार माँ करवटें बदल रही थी , माँ के करवट बदलने के कारण माँ मैं भी माँ के साथ जाग रही थी, और सोच रही थी कि भगवान् मेरी माँ कि परेशानी दूर करो, मैं अपना दुःख किसी से बाँट नहीं पा रही थीं इसलिए शायद माँ ज्यादा परेशान थीं , मैं माँ का दुःख बांटना चाहती थी लेकिन माँ मेरी उपस्थिति को नहीं महसूस कर रही थीं , देखते ही देखते रात बीत गयी और भोर हो गयी , पक्षियों के चहचहाने कि आवाज कानो में पड़ते ही माँ एक दम से उठी और फिर से अपने काम पर लग गयी, माँ ने पूरा घर साफ़ किया और नहा कर तुलसी जी कि पूजा कि और माँ ने पूजा में भगवान् से माँगा कि हे भगवान् मेरी लाज रख लेना, माँ का यह अधुरा वाक्य सुनकर मैं विचलित हो गयी कि ऐसा क्या हो गया है जिससे माँ कि लाज खतरे में पड़ गयी, माँ के अधूरे यह शब्द का क्या मतलब है? माँ किस बात को लेकर परेशान है, मैं कैसे पता लगाऊं, माँ रसूई में गयी और सबके लिए चाय बनाई पहले दादी के लिए माँ चाय लेकर गयी और माँ ने देखा कि दादी पूजा कर रही है सो माँ दादी कि चाय कटोरी से ढक कर लोट ही रही थीं कि दादी ने आवाज लगाईं ' बहु जरा इधर आ और मेरे साथ पूजा में बैठ, माँ दादी के साथ पूजा में बैठी तो दादी ने माँ से कहा कि गर्ववती स्त्री को रामायण सुननी चाहिए इससे होने वाले बच्चे पर अच्छा असर पड़ता है, इसलिए आज से रोजाना तू रामायण सुना कर, मैं चाहती हूँ कि मेरा पोता भगवान् रामचंद्र कि तरह ही बने, यह सुनकर माँ कर मुंह रात कि तरह ही उतर गया, मुझे भी यह सुनकर बहुत दुःख हुआ कि दादी मेरे आने का नहीं बल्कि अपने पोते के आने का इन्तजार कर रहीं है, लेकिन मेरा दुःख मुझे मेरी माँ के दुःख से बहुत कम था, माँ रामायण सुन रही थीं लेकिन उनका ध्यान कहीं और था , अन्दर ही अन्दर उन्हें कोई बात खाय जा रही थी, एक बार को मेरे मन में यह बात भी आई कि कहीं माँ दादी की बात से ही तो दुखी नहीं है? शायद हां माँ सच में दादी कि बातों से ही दुखी है, चूँकि माँ को कही न कही मेरे होने का अहसास है, जो माँ दादी को बता नहीं पा रही है और आने वाले कल को सोच कर दुखी हो रही है। रामायण सुनकर माँ पिताजी के लिए चाय लेकर गयी और पिताजी से अटकते अटकते बोली कि' सुनिए मुझे आपसे एक बात करनी है' पिताजी ने कहा कि हां-हां बोलो, माँ ने कहा कि मेरे मन में एक डर है, पिताजी ने बड़ी उत्सुकता से पूछा कि कैसा डर? सब कुछ ठीक तो है न? माँ ने कहा कि अच्छा यह बताइये कि आपको बेटा चाहिए कि बेटी? पिताजी ने चाय का कप नीचे रखकर माँ का हाथ पकड़कर बोले, ' तुम ऐसा क्यों पूछ रही हो' । माँ ने कहा कि ऐसे ही बताइये ? पिताजी ने कहा कि ठीक है अगर तुम यह जानना ही चाहती हो तो सुनो ................(शेष अगले एपिसोड में )
Sunday, 13 December 2009
एक लड़की की कहानी (एपिसोड - 2)
माँ ने जैसे ही कुण्डी खोली वैसे ही देखा की दरवाजे पर एक बुजुर्ग ओरत खड़ी थी, जो दिखने में बिल्कुल दुबली पतली और कमजोर सी थी , उसने सीधे पल्ले की साड़ी पहन रख्ही थी और कंधे पर एक बैग लटका रखा था, मैं यह सोच ही रही थी की यह बुजर्ग ओरत कोन है , इतने में माँ ने उस ओरत के पैर छुए और कहा की माता जी आपको सफर में कोई परेशानी तो नही हुई? माँ ने जैसे ही यह कहा तो मैं समझ गयी की यह तो मेरी दादी हैं,यानी मेरी माँ की सास, मुझे बहुत खुशी हो रही थी यह सोच कर की मेरी दादी मुझे कितना प्यार करेंगी और मुझे कहानी भी सुनाएगी, माँ के साथ भीतर आकर दादी ने देखा की पापा चाय और पकोड़े खा रहे हैं , दादी पापा से बोलीं, 'ओहो मेरे आने की खुशी में तूने पहले से ही पकोड़े बनवा रखें है ', यह सुन कर पापा मेरी माँ की ओर देखने लगे ओर थोड़े से शर्मा भी गए, ओर उन्होंने अपनी माँ यानि मेरी दादी के पैर छुए ओर कहा की माँ यह पकोड़े आपके आने की खुशी के साथ साथ एक ओर मेहमान के आने की खुशी में बने है, मेरी भोली दादी ने समझा की शायद सच में कोई ओर मेहमान घर में आने वाला है, दादी ने मुह बनाते हुए पापा से पूछा की कोन आ रहा है? पापा ने कहा की अपनी बहू से ही पूछ लो न की कोन आने वाला है, यह सुन कर मेरी माँ थोड़ी से शर्मा उठीं ओर कमरे में चली गयी, माँ के यूँ कमरे में जाने से शायद मेरी दादी को मेरे आने का अंदाजा लग गया ओर वह माँ के पीछे ही बच्चो की तरह भागती हुई गयी, दादी ने माँ से पूछा की जल्दी बता न की क्या बात है? क्या कोई खुशखबरी है? दादी के यह बोलते ही माँ ने शर्माते हुए सर हिलाया ओर दादी के पैर छुए , मेरी दादी ने माँ को तुरंत कंधो से पकड़ कर उठाया ओर कहा की भगवान् करे की तुझे चाँद सा बेटा हो, इसके अलावा ओर भी न जाने कितने आशीर्वाद दादी ने माँ को एक ही साँस में दे डाले, दादी के ऐसा बोलने पर मुझे बहुत दुःख हुआ ओर मैंने सोचा की दादी तो मेरे आने की नही बल्कि एक लड़के के आने की उम्मीद कर रही है, लेकिन मैंने सोचा की मैं दादी को इतना प्यार करूंगी की दादी मुझे भी लड़के की तरह प्यार करेंगी, मैंने दादी के इस भेदभाव को एक पल में ही भुला दिया, मैंने सोचा की चलो मेरे माँ ओर पापा तो मुझे प्यार करते है न, बस ओर मुझे क्या चाहिए , दादी का प्यार तो मैं पा ही लूंगी , अचानक पापा पर नजर गयी तो देखा की पापा दरवाजे के कोने पर खड़े हो कर दादी ओर माँ की बातें सुन रहे थे ओर बहुत खुश हो रहे थे, दादी ओर अपनी माँ के बीच का प्यार देख कर मुझे भी बहुत अच्छा लग रहा था, दादी ने माँ को कुछ बातें संघाई ओर माँ से अपना ध्यान रखने को कहा ओर उन्हें अपने साथ ही कमरे से बहार लें आई, दादी ने पापा को बहार आकर कहा की अब तू बाप बनने वाला है इसलिए थोड़ा सयाना बन जा ओर अपनी पत्नी का ध्यान रख, मुझे एक मोटा ताजा बच्चा चाहिए , दुबला पतला बीमार सा बच्चा मुझे नही चाहिए, सो ऐसा कर आज से ही बहू के लिए रोजाना ताजा फल ओर कुछ मेवा ले आया कर, इसके लिए अलग से ढूध भी बाँध दे, ओर आज से पानी भरने ओर कोई भी भारी काम तू करेगा, बहू से कोई भी भारी सामान नही उठवाना , वैसे तो अभी कुछ दिन मैं यही हूँ लेकिन ज्यादा दिन तो मैं नही रुक सकती, तुझे मालूम ही है की गाव में कितना काम छोड़ कर आई हु, तेरे पिताजी को ही सारा काम करना पड़ रहा होगा, इतने में मेरी माँ दादी से बोली की माताजी आप सफर से थक गयी होंगी सो आप आराम करिए इतने मैं आपके लिए खाना बनाती हूँ, यह बोलकर माँ दादी के लिए खाना बनाने के लिए रसोई में आ गए ओर दादी अन्दर जा कर आराम करने लगी, दादी की बातो का पिताजी पर इतनी जल्दी असर हो गया की वो भी माँ के पीछे ही रसोई में आ गए ओर माँ से बोले की लाओ कुछ काम मैं कर देता हूँ, यह सब देख कर मुझे बहुत अच्छा लग रहा था की मेरे आने के लिए सब कितने खुश हैं ओर मेरी माँ कितना ख्याल रख रहे है, माँ ओर पिताजी ने मिलकर खाना बना लिया ओर माँ ने पिताजी से कहा की आप माताजी को बुला लो मैं खाना परोस देती हूँ, माँ ने पिताजी ओर दादी दोनों की थाली लगा दी ओर दोनों खाना खा बैठ गए, दादी ने माँ को डाटा ओर कहा की चलो तुम भी साथ बैठो ओर जल्दी से खाना खाओ ओर उसके बाद एक गिलास ढूध पीकर ही सोना, ओर हा अगर घर में केसर हो तो केसर दाल कर ढूध पीना इससे बच्चा गोरा होता है, दादी की ये सारी बात्तें सुनकर मुझे अन्दर ही अन्दर गुदगुदी हो रही थी की मैं अब गोरी हो जाउंगी, मैं खुश हो ही रही थी की दादी ने माँ से एक बात कही जिसे सुनकर माँ रो पड़ी.............(शेष अगले एपिसोड में...)
आपको यह कहानी कैसी लग रही है यह जरुर बताएं .
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Sunday, 6 December 2009
एक लड़की की कहानी (एपिसोड - 1)

मेरा नाम 'लड़की ' है और आज मैं आज आपको अपनी कहानी सुनाती हूँ। अभी मेरा जन्म नही हुआ है लेकिन सामाजिक तोर से मेरा नामकरण मेरे जन्म लेने के बहुत पहले ही हो चुका है। और मेरी कहानी उस दिन से शुरू होती है जब मैंने मेरी माँ के पेट में मैंने अपने आने की दस्तक दी। मेरी माँ की खुशियों का कोई ठिकाना नही था और वह इतनी खुश थी की अपनी खुशी किसी से बाँट भी नही पा रही थीं, उनकी इस खुशी में मैं भी कुश थी और माँ को मैं अन्दर से ही गुदगुदा रही थी जिससे माँ को मेरी हरकत का पता चल रहा था और वो उस अहसास को महसूस करते हुए और खुश हो रही थी, माँ ने पुरे दिन इन्तजार किया की मेरे मेरे पिताजी काम पर से घर लोंटें और माँ उनको यह खुशखबरी दें की वो पिता बनने वाले है, माँ ने उस दिन पकवान बनाय और शाम को पिताजी के घर आते ही उन्हें चाय देते हुए शर्माते हुए कहा की मैं आपको एक खुशखबरी सुनाना चाहती हूँ, तो पिताजी ने बड़ी उत्सुकता वश माँ से कहा की हाँ हाँ जल्दी बताओ , शायद मेरे पिताजी को माँ के शर्माने से पता चल गया होगा की माँ उन्हें कोन सी खुशखबरी सुनाना चाहती हैं, लेकिन फ़िर भी पिताजी यह बात माँ के मुंह से ही सुनना चाहते थे। इसलिए उन्होंने बड़े प्यार से माँ से पूछा की जल्दी बताओ न , माँ ने शर्माते हुए धीरे धीरे कहा की आप पिता बनने वाले हैं। यह सुनते तो मानो मेरे पिताजी के पाँव जमीन पर नही टिके और उन्होंने माँ को गोद में उठा लिया और भगवान् से पहले माँ को शुक्रियादा किया की 'तुमने मुझे आज पिता बनने का सुख दिया' फ़िर दोनों ने भगवान् के मन्दिर के सामने अपना सिर जुखाते हुआ भगवान् को भी धन्यवाद किया, मैं अपने माँ और पिताजी को मेरे आने पर इतना खुश देख कर बहुत खुश हो रही थी और बस चाह रही थी की मैं कब अपने माँ और पिता के हांथों में खेलूं और उनका वो प्रेम पाऊं जो वो लोग मुझे देना चाहतें है,
अपनी खुशी का इजहार करने के चक्कर में पिताजी की चाय तो ठंडी ही हो गयी थी। इसलिए पिताजी ने माँ से कहा की अब एक गरमा गरमा चाय बनाओ और हां साथ में गर्म-गर्म पकोड़े भी बना लो मैं १० मिनट में आता हूँ, माँ चा और पकोड़े बनाकर टेबल पर रख ही रहीं थीं की इतने में पिताजी मिठाई का डिब्बा लेते हुए घर में घुसे , माँ ने पिताजी से पूछा की आप कहा गए थे, देखो चाय फ़िर से ठंडी हो जायेगी, चलिए हाँथ धोलो और जल्दी से आकर चाय और पकोड़े खा लो, पिताजी ने कहा की हां हां ठीक है, मैं हाँथ धो कर आता हूँ लेकिन तुम भी पहले हाँथ धो लो और यह मिठाई एक प्लेट में रख लो, माँ समझ गयी और माँ ने पूजा के लिए एक प्लेट त्यार कर ली, पिताजी जैसे ही हाँथ थो कर आए तो माँ ने कहा की चलिए जल्दी से पूजा कर लेतें हैं वरना चाय ठंडी हो जायेगी, लेकिन पिताजी को चाय के ठंडे होने का कोई डर नही था , वह तो उस दिन भगवान् का तहे दिल से शुक्रियादा करना चाहते थे, सो पूजा में बैठे और भगवान् को भोग लगा कर परशाद पहले माँ को २ बार खिलाया (एक मेरे हिस्से का और दूसरा माँ के हिस्से का ) उसके बाद ख़ुद ने भी परशाद खाया और फ़िर चाय पीने के लिए टेबल पर आए। माँ और पिताजी चाय पीते - पीते मेरे आने के लिए अलग अलग त्यारियों की बातें कर ही रहे थे की इतने में दरवाजा खटखटाने के आवाज आई , माँ उठी और दरवाजे की कुण्डी खोल ही रही थी की....(शेष अगले एपिसोड में )
Thursday, 3 December 2009
क्यूंकि तुम लड़की हो॥

क्यूंकि तुम लड़की हो। यह शब्द मैंने अपने जीवन में लाखो बार सुने है, लेकिन मेरे अपनों से नही बल्कि बहार वालो से यानी समाज से। और मैंने ही क्या यह शब्द तो लगभग सभी लडकियों ने सुने ही होंगे, वो बात अलग है की हमारे माता पिता भले ही हमे ऐसा न बोलते हों, लेकिन कही न कही वो भी दुव्यवहार करतें ही हैं, दुसरो की लडकियों को तो उन्होंने भी कभी न कभी बोला ही है, की तुम एक लड़की हो तुम्हे ऐसा नही करना चाहिए, तुम्हे वैसा नही करना चाहिए, तुम्हे ऐसा रहना चाहिए, तुम्हे ऐसा हँसना चाहिए, तुम्हे ऐसे चलना चाहिए, और न जाने क्या क्या?
मेरे मन में कही बार यह सवाल आता है की हम जिस समाज की बात करतें है आखिर वह समाज क्या है? किसने बनाया है उस समाज को? कोन कोन लोग शामिल हैं उस समाज में?
लेकिन शायद अब मैंने यह बात जान ले है की समाज किसी और ने नही हम सभी लोगो ने मिलकर बनाया है। हमने एक ऐसे समाज की स्थापना की है जिसमे हमे अपनों को बचाना है और दुसरो के लिए सीमाए तय करनी है, जब अपनी बेटी की बात होती है तो माता पिता उसे देश के सर्वोच्च पद पर देखना चाहतें है, फ़िर भले ही समाज कुछ भी कहे किसी को किसी बात की परवाह नही होती, लेकिन जब बात समाज में रहने वालो की बेटियों की होती है तो यह बात शायद दुसरो को अच्छी नहीं लगती।
अब कोई यह बताये की समाज के नियम किसके लिए हैं? अपनी सहूलियत के हिसाब से नियम तय करने वाले इस समाज पर कोई कैसे भरोसा करे?
लडकियों को समाज के नाम पर न जाने कितने ताने मिलतें है? वह सुबह से शाम तक कितनी बार सुनती है की ऐसे मत करो क्यूंकि तुम एक लड़की हो। तुम्हे परे घर जाना है, ससुराल वालें क्या कहेगे? क्या आपने किसी लडको को यह सब सुनते हुए देखा है? नही। कभी नही? एक लड़की का जीवन शादी के बाद पुरी तरह से बदल जाता है, उसकी आदतें, उसका बचपन, उसके माता पिता, उसका हँसना, उसका चलना आदि सभी कुछ अर्थार्थ उसका जीवन की एक नयी शुरात यानी एक नया जन्म, यह नया जन्म एक लड़के का क्यो नही होता? उसकी लाइफ में कोई परिवर्तन क्यो नही आता? वह क्यो शादी के बात भी अपनी आदतें नहीं बदलता? देखा जाए तो वह बदलेगा भी क्यो? लड़का जो ठहरा !
लडकियों को बचपन से ही एडजस्ट करना सिखाया जाता है, बचपन में भाई के साथ एडजस्ट करना , अगर सब्जी कम है तो ख़ुद रूखे खाना और भाई के लिए छोड़ देना, क्यूंकि वो एक लड़का है। हो सकता है कुछ घरो में ऐसा न हो लेकिन कही न कही लडकियों को एडजस्ट करने को कहा ही जाता है। माँ गिलास भर के लड़के को दूध पीने को देती है लेकिन लड़की को नही देती, क्यूंकि वह एक लड़की है! ऐसी ही बहुत सी बातें है जो मैं लिखना चाहती हूँ, इसलिए
मैं आपको एक लड़की की कहानी सुनाना चाहती हूँ जो एपिसोड वाइज आपको पढाई जायेगी, अगर आप भी मेरी इस कहानी का हिस्सा बनना चाहतें हैं तो आप अपनी कोई आपबीती मेल से भेजें. हर सोमवार को एक एक एपिसोड आपको पड़ने को मिलेगा, हो सकता है हमारी इस कोशिश से समाज की आंखों पर से परदा हट जाय, क्यूंकि अक्सर लोग सुनी सुनाई बातों से ज्यादा पड़ी पढाई बातों पर विश्वास करतें है, तो चलिए शुरू करें है हम एक आन्दोलन जिसमे समाज में हो रहे लडकियों से दोहरे व्यवहार को ख़तम करने का संकल्प लेतें है, यक़ीनन हमारे द्वारा शुरू किया यह आन्दोलन हमारी आने वाली नयी पीड़ी को समान से जीने का अधिकार देगी, यदि हमारी माँ और नानी ने यह आन्दोलन पहले ही शुरू कर दिया होता तो शायद हम भी बराबरी के अधिकार के साथ जी रहे होते। खेर अब भी देर नही हुई बस शुरू करतें है एक लड़की की कहानी। और मिलतें है हर सोमवार को।
आप मुझे मेल कर सकतें है॥ merikoshish@gmail.com
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