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Tuesday, 24 November 2009

आधे सोए, आधे जागे।


कुछ वर्ष पहले तक जहाँ नाइट जॉब को लोग गलत नजरिये से देखते थे और नाईट जोब्स करने वालों को समाज में शक भरी निगाहों से देखा जाता था वहीं बदलते समय की बदलती जरूरतों ने आज लोगों का नजरिया भी बदला है। आज वही नाइट जोब्स लोगों को खूब लुभा रहे हैं। हाँ, तर्क अलग अलग हैं।
किसी का कहना है कि समय और पैसा दानों की बचत के लिए इससे बेहतर और कोई जॉब हो ही नहीं सकती। कोई इन नाईट जाब्स के साथ-साथ दिन में भी कोई छोटी मोटी जॉब करके एक्सट्रा इनकम पैदा करके खुश है तो कोई दिनभर मौज मस्ती और अपना शोक पूरा कर खुश रहता है। किसी को फैमिली के लिए समय आराम से मिल जाता है तो कोई पढाई के लिए समय निकाल पाता हैं। कारण कोई भी हो लेकिन सभी को इन दिनों नाइट जोब्स काफी पसन्द आ रही हैं खासतौर पर युवाओं में तो इन नाइट जोब्स के प्रति काफी आकर्षण पैदा हो रहा है। और इन युवाओं में महिलाएं भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं।
महिलाओं का कहना है कि नाईट जाब्स हमारी लाइफ में और अधिक कुछ करने के विकल्प देती हैं। वरना तो ऑफिस से घर और घर से ऑफिस तक की लाइफ में ही सब कुछ सिमटा सा लगता था। अब हम अपने लिए भी टाइम निकाल सकते हैं जो कि सही जगह पर इस्तेमाल किया जा सकता है। इन जोब्स ने लाइफ को बहुत आसान बना दिया है।
मुख्यत: आज के भागदौड़ और प्रतियोगिता युक्त समय में ज्यादातर महिलाओं की समस्या यह है कि वे अपने काम व परिवार के बीच संतुलन स्थापित नहीं कर पाती और कई बार यही कारण है कि वे हमेशा फ्रस्ट्रेशन से ग्रसित रहती हैं। परिवार की नाराजगी के साथ काम का बेहिसाब बोझ उनकी जिंदगी में जहर घोल देता है लेकिन ये नाइट जोब्स एक तरह से बदलते समय के साथ कदम मिलाकर चलने का ही जरिया है। रात को 6-8 घंटे काम कर के अच्छा खासा पैसा भी कमा लेते हैं और फिर भी इनके पास काफी समय बचा रहता है अपने और अपने परिवार के लिए। यदि यह चाहे तो इस समय में कुछ और भी एक्सट्रा कर सकती हैं। अपने सी.वी को और बेहतर बनाने के लिए कोई कोर्स या फिर अपनी रूचि के हिसाब से साइड वर्क या बिजनेस कर सकते हैं। रात को जोब्स करने के बाद आप चाहें तो दिन में थोड़ा आराम करने के बाद अपना कोई काम भी कर सकते हैं जबकि अन्य जोब्स में दिन भर काम करने के बाद आप रात को जाकर सोना ही पसंद करेंगे। देखा जाए तो एक तरह से ये जोब्स लोगों को एक्टिव लाइफस्टाइल सिखा रहे हैं। इन लोगों की लाइफ अन्य लोगों के मुकाबले अधिक डिसीप्लीन युक्त और वक्त की पाबंद है। इसी वजह से शायद इन क्षेत्रों के प्रति आज क्रेज काफी बढ़ रहा है। हालाकि गर्ल्स के लिए यह थोड़ी रिस्की हो सकती है। लेकिन बदलते समय की डिमांड है कि लड़कियों को थोड़ी बोल्ड और सतर्क होना चाहिए जब लड़कियां हर क्षेत्र में पुरषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल सकती हैं तो ये इसमें क्यों पीछे रहें। बस थोड़ी सी सेफ्टी का ध्यान रखने की जरूरत है। वैसे भी प्रत्येक ओर्गनिजेशन गर्ल्स एम्प्लाइज के आने व जाने के समय सिक्यूरिटी के पूरे इंतजाम करती है। ऑफिस में भी इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता है कि फैंडली माहौल हो ताकि गर्ल्स पूरी तरह से कम्फर्ट होकर काम कर सकें। ऑफिस में भी अच्छी खासी सिक्यूरिटी के पुख्ता इंतजाम होते हैं।
सोफिया जो कि एक डोमैसटिक कोल सैंटर में काम करती हैं उनका कहना है कि नाईट जाब्स यकीनन डे जाब्स से काफी अच्छे हैं। यहां सैलरी भी अच्छी मिलती है और हमारे पास दिन में भी बहुत कुछ करने को होता है। दिन में हम चाह कर भी पूरे दिन नहीं सो सकते, बस थोड़ा आराम करके अपनी फैमली के साथ समय बिताने का मौका मिलता है जो कि डे जाब्स में नहीं मिल पाता। लेकिन परेशानी बस यही है कि पास-पड़ोसी की प्रतिक्रिया बहुत ही खराब लगता है जब सुबह हम घर आते हैं। उनकी नजरें ऐसी होती हैं जैसे न जाने हम कितना गलत काम करके आए हों।

मोनिका का भी यही मानना है कि माता-पिता को तो हमपर पूरा भरोसा होता है तभी हम लड़किया आज घर से न केवल बाहर निकल पा रही हैं बल्कि रात में भी काम कर रही हैं। लेकिन जब रि’तेदारों को पता चलता है तो वह दस तरह की बाते बनाते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है उनकी ऐसी बातों से हमें पीछे नहीं हठना चाहिए। जब लड़कियों ने घर से बाहर निकलना शुरू किया होगा तब शुरूआत में उनके लिए भी इसी तरह से बात बनाई जाती होंगी। अगर वह हार मान लेती तो हम आज भी घर की चार दिवारी में कैद होते।

आंचल
नाईट जाब्स करना यकीनन एक बड़ी चुनौती है अकेले हमारे लिए ही नहीं बल्कि पूरे परिवार के लिए। लेकिन यदि हम सही हैं तो हमें किसी की बात से फर्क नहीं पड़ना चाहिए। लोगों का क्या है कुछ दिन बोलेगे फिर एक दिन अपने आप बंद हो जाएंगे। वैसे हमारे पड़ोस में पहले जो लोग बोलते थे कि लड़कियों को रात में नौकरी नहीं करनी चाहिए आज वहीं लोग मेरे जोब्स को देखकर अपनी लड़की की भी जोब्स नाईट शिफ्ट में कराना चाहते हैं ताकि दिन में वो अपनी पढाई कर सकें।

मनोचिकित्सक समीर पारिख का कहना है कि चाहे लड़की हो या लड़का नींद तो सभी के लिए बहुत जरूरी है। प्रत्येक इंसान को 6-8 घंटे की नींद लेना बहुत जरूरी है। इसलिए रात में जोब्स करने के बाद भी आपको अपनी नींद पूरी करने का पूरा ध्यान रखना चाहिए। यदि आपका ‘शरीर रात में काम करने के लिए परफैक्ट नहीं है तो आपको ऐसी नौकरी नहीं करनी चाहिए वरना आपको स्लीपिंग प्रोबलम हो सकती हैं। आप चाहे दिन में जोब्स करें या रात में बस इस बात का ध्यान रखें कि आपको अपनी नींद हर हालत में पूरी करनी चाहिए। नींद पूरी न होने से आपके काम पर भी काफी गलत प्रभाव पड़ सकता है और आप वीकनैस महसूस कर सकते हैंं
प्रस्तुति:- प्रीति पाण्डेय

Friday, 20 November 2009

हम किसी से कम नहीं....


महिलाएं आज भले ही हर क्षेत्र में उंची तनख्वाह और उंचे ओहदे पर काम कर रही हैं। लेकिन अभी भी कुछ क्षेत्र ऐसे हैं, जहां महिलाओं को यह कह कर मना किया जाता है कि उनके प्रजनन से संसाधन का अपव्यय होगा। जी हां हम बात कर रहे हैं, सुखोइ विमान उड़ाने पर वायु सेना के उपाध्यक्ष एयर मार्शल के बयान पर। उन्होंने कहा कि महिलाओं के परिवार बढ़ाने की क्षमता के कारण फाइटर पायलट के प्रशिक्षण पर किए जाने वाले समय और खर्च का अपव्यय होगा। आइए जानते हैं कि इस पर महिलाओं की क्या प्रतिक्रिया है।
1. संगीता - महिलाओं को बराबर का हक दिलाने की बात करने से कुछ नहीं होगा। महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी सेवा को जिम्मेदारी के साथ निभा रही हैं। वायुसेना में भी महिलाएं काम कर रही हैं लेकिन सिर्फ़ प्रजनन के कारण अगर उसे फाइटर पायलट के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता तो ये नाइंसाफी है। अगर किसी लड़की में एक फाइटर पायलट बनने के सभी गुण मौजूद हैं तो उसे रूका नहीं जाना चाहिए।
2. पूजा - माना कि एक फाइटर पायलट के प्रशिक्षण पर लगभग 11 करोड़ रुपये का खर्च आता है। यह आधार बिल्कुल ठीक नहीं है कि बच्चे को जन्म देने के लिए महिलाएं एक साल तक सुखोइ नहीं उड़ा पाती जिससे समय का अपव्यय होता है। अगर ऐसा है तो महिलाओं को कोई काम नहीं करना चाहिए। अंतरिक्ष यात्री, पुलिस सेवा और सेना, ये कुछ ऐसी सेवाएं हैं जहां महिलाओं को काफी शारीरिक श्रम करना पड़ता है। लेकिन वे अपनी भूमिका को बेहतर तरीके से निभा रही हैं।
3. नमन - भारत में अभी तक सेना में महिलाओं की संख्या और देशों की तुलना में काफी कम है। क्या महिलाएं केवल बच्चे पैदा करने की मशीन हैं। पुरूष हर बात में उन्हें कहते हैं कि रहने दो ये मर्दों का काम है। आज वह कौन सी जगह है जहां महिलाएं पुरषों के कंधे से कंधा मिलाकर नहीं चल रही हैं। केवल शारीरिक संरचना को ही आधार नहीं बनाया जा सकता, जिसके पास योग्यता है उसे किसी काम से मना नहीं किया जा सकता।
4. सबा - मैं वायु सेना के उपाध्यक्ष के बयान से पूरी तरह असहमत हूं। जो महिलाएं फाइटर पायलट बनने के लिए पूरी तरह फिट हैं, उन्हें केवल प्रजनन की क्षमता के कारण मना नहीं किया जाना चाहिए। वैसे भी कोई महिला अपने काम से अंतिम के चार महिनों के लिए ही छुट्टी लेती हैं। ऐसा भी नहीं है कि पुरूष कभी लंबी छुट्टी नहीं लेते हो। ऐसे में ये कहा का न्याय है कि बच्चे को जन्म देना एक बीमारी मान ली जाये।
5. नीतू - आये दिन सेना में महिलाओं के साथ होने वाले दोयम दर्जे के व्यवहार की खबरे सुनने को मिलती हैं। सेना की अधिकतर खबरे बाहर तक नहीं आ पाती। महिला कर्मियों को उनके मातृत्व अवकाश से वंचित करने की बात करना सरासर बेबुनियाद है। क्या किसी महिला को एक विशिष्ट कार्य करने से इसीलिए रोका जाना चाहिए कि वे मातृत्व अवकाश लेती हैं? औरत होने कारण उसे किसी काम से कैसे वंचित किया जा सकता है।
प्रस्तुति:- प्रीति पाण्डेय

Friday, 17 April 2009

कैसी हो हमारी सरकार ?


प्रीती पाण्डेय
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जनता से , जनता के लिए और जनता के द्बारा सरकार बनाना ही एक लोकतान्त्रिक देश की पहचान होती है। भारत का लोकतंत्र भी इसी प्रक्रिया पर आधारित है। लेकिन अफ़सोस की बात यह है की न तो हमारे नेता आम जनता में से होतें हैं और न ही अपने को वह जनता के लिए समझते हैं। रही बात जनता के द्बारा तो बस यही एक परम सत्य है की कुर्सी तक पहुँचने के लिए कोठी में रहने वाले नेता को उन झुगियों में भी हाथ जोड़ कर जाना पड़ता है जंहा से आमतोर पर उन्हें गुजरना भी पसंद नहीं होगा। आख़िर वह ऐसा क्यों न करें , ऐसे समय पर तो एक - एक वोट भी बहुत कीमती होता है। लेकिन सवाल यह उठता है की जब सभी एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं तो ऐसे में जनता आख़िर किसको वोट दे ? किस पैमाने के आधार पर वह अपनी सरकार का चुनाव करे? कैसी होनी चाहिए हमारी सरकार ? आइये जानते हैं बुद्धिजीवियो से उनकी महतवपूर्ण राय-
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नंदिता दास अभिनेत्री , सामाजिक कार्यकर्ता
यह एक अच्छा सवाल है कि हमारी सरकार कैसी हो ? क्यूंकि हम सभी वोट देते हैं इसलिए जब तक हमें यही स्पष्ट नहीं है की हमें अपनी सरकार कैसी चाहिए तब तक हम यूँही अपना कीमती वोट जाया कैसे कर सकतें हैं ? रही बात मेरी तो मेरा मानना है की हमारी सरकार पारदर्शी होनी चाहिए जहा उसके नागरिक को प्रत्येक व्यवस्था के बारे में पता हो। चूँकि हम भी सरकार की तमाम व्यवस्थाओं से जुडें हुयें हैं इसलिए हमें भी इमानदार होना पड़ेगा। एक दुसरे पर अंगुली उठाने से कोई फायदा नहीं है, यह एक ऐसा चक्रव्यूह है जिसमें हम सभी फंसे हुयें हैं और इससे तभी निकला जा सकता है जब हम सभी मिलकर इस चक्रव्यूह को तोडें । चूँकि यदि व्यवस्था ख़राब है तो कहीं न कहीं उसे ख़राब करने में हम और आप भी शामिल हैं । ख़राब व्यवस्था का हिस्सा बनकर अक्सर स्थिति से समझोता करना हमारी आदत बन चुकी है। भ्रष्टाचार शब्द केवल नेताओं और सरकार के लिए ही इस्तेमाल करना तब सही है जब हम स्वयम भ्रष्ट न हों । धर्म , पैसे या अन्य किसी लोभ में आकर वोट देना अपने वोट का अपमान करने के समान है। इसलिए हमें एक आदर्श समाज की स्थापना करनी होगी तभी हम एक आदर्श सरकार का सपना साकार कर पायेंगे।
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डा युधिष्ठिर शर्मा
पूर्व न्यायधीश
जिला न्यायालय , गाजियाबाद
मेरा मानना है की शासन ऐसा हो जहाँ अमीर -गरीब का कोई भेद न हो। जो नियम और कानून कोठी में रहने वाले के लिए हों वही नियम और कानून झोपडी में रहने वाले के लिए हों अर्थार्थ कानून व्यवस्था सुधरी हुई हो। चूँकि जहाँ की कानून व्यवस्था अच्छी होती है वंहा अपराध नामक
शत्रु डर के मारे दूर भागता है। और जहाँ अपराध नहीं होता वह देश अपने आप में ही एक संपन्न देश होता है। सरकार परिवार के उस मुखिया की तरह है जिसके जीवन का बस एक ही उद्देश्य होता है की उसका परिवार का हर सदस्य सुख समृधि से परिपूर्ण रहे। सरकार जनहित के लिए काम करे। सरकार के नुमायेंदें शिक्षित हों , जो एक शिक्षित समाज की स्थापना कर सकें । सरकार बनाने के लिए ऐसे व्यक्ति चुने जाएँ जो जनभावना से प्रेरित हों और जनहित के लिए कार्य करें। ऐसा जनतंत्र का निर्माण करें जिसमें सभी निर्भीक होकर चैन से सों सकें । प्रत्येक व्यक्ति अपने अधिकारों का प्रयोग स्वतंत्र रूप से कर सकें। इसलिए सरकार जनता के लिए हो और जनता के लिए ही काम करे।
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कुलदीप नैयर
वरिष्ठ पत्रकार
सरकार ऐसी हो जो जनता के लिए हो और जनता के हित में सोचे। जिसके राज्य में सभी के सर पर छत हो और पेट में खाना हो। जिसके नागरिको में जागरूकता हो और सभी के पास रोजगार हो। आजादी के ६२ वर्ष बाद भी यदि हम आज भी अपने देश को गरीबी से मुक्ति नहीं दिला पाएं तो यह हमारे लिए बहुत ही शर्म की बात है। आज भी हम गरीबी से नहीं उबरे हैं । अच्छी सरकार वही है जिसके शासन में किसी भी नागरिक की आंखों में आंसू न हो। सरकार का सबसे पहला काम यही है की वह अपने देश को गरीबी मुक्त कार्य । उप्पर उठे लोगो को और उप्पर उठाने की बजाये गरीबो को उप्पर उठाय । हमारा देश अगर आज भी विकसित नही हो पाया है तो इसके पीछे घूसखोरी ही सबसे बड़ा कारण है। प्रत्येक काम को करवाने के लिए चपरासी से लेकर अधिकारी तक सबका अलग अलग हिसाब - किताब है। ऐसे में जो धनि वर्ग है वह तो अपना काम अपने पैसो के बल पर करवाने में सक्षम है लेकिन निर्धन बेचारा कहा से घूस देने के लिए धन लायें । उसके पास तो पेट भरने के लिए पैसे नही तो वह यह घूस कैसे दें? पहले कहीं एक -दो आदमी हुआ करता था जो रिश्वत लिया करता था, लेकिन आजकल तो यह परम्परा बन गयी है। और अफ़सोस की बात है की सरकारी काम को करवाने में ही ऐसी परम्पराए लागू होती हैं । व्यवस्थाओं को तोड़ कर उनका मजाक उडाया जाता है। जिस देश में कानून तोड़ना कोई बड़ी बात नहीं समझी जाती वंहा कैसे कोई व्यवस्था सुचारू रूप से चलाई जा सकती है। कानून बनता बाद में है लेकिन उससे बच निकलने के उपाय पहले ही आ जाते है। और वह उपाए है रिश्वत । हमारे देश में रिश्वत को सभी समस्याओं से बच निकलने की एक मात्र दवा की उपाधि प्राप्त हो चुकी है। बस रिश्वत दीजिये और नियमों को धडाधड तोडिये ।
अब बात करतें है। सुरक्षा की तो जहाँ तक मेरा मानना है , जिस देश की सरकार अपने देश के नागरिको को ऐसी सुरक्षा दे की वह अपने देश में कहीं भी आजादी से घूम सकें , तो यकीनन यह एक अच्छी सरकार का ही उदाहरण है। चूँकि जब व्यक्ति सुरक्षित है तभी बाकी सारे काम किए जा सकतें है। सुरक्षा किसी भी देश की पहली आवश्यकता है। आख़िर में मैं यही कहूँगा की सरकार में साफ़ सुथरी छवि वाले व्यक्ति हों जो सच में जनता के हित में कार्य करें , तभी हमारी सरकार एक आदर्श सरकार कहलाई जा सकती है।
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मनीष शिशोदिया
सामाजिक कार्यकर्ता
सरकार की बात होती है तो हमें सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए की सरकार से हमारा क्या अभिप्राय है अर्थार्थ सरकार क्या है और हम उससे क्या चाहते हैं? सरकार कोई एक आदमी या कोई एक पार्टी नही है। सरकार तो एक पूरा तंत्र है जो हमारे चारो और घूमता रहता है। फ़िर चाहे बात सरकारी स्कूल की हो या किसी भी सरकारी कार्यालय की। नेता तो बस इस पुरे तंत्र को चलाने वाले होतें हैं। एक नेता के आने से सरकारी कार्यालयों में नयी भर्तियाँ नहीं हों जाती। सब कुछ ज्यों का त्यों ही रहता है। बस नया चालक आ जाता है। व्यवस्था में कुछ फेर बदल कर दिया जाता है लेकिन व्यवस्था वही के वही रहती है। सरकार ऐसी होनी चाहिए जिसे स्वम जनता चलाए , क्यूंकि जहा सरकारी ठप्पा लगता है वहीं से सारी फसाद शुरू होती है। सरकारी कर्मचारी बिना घूस लिए काम करने को तयार नही होते। ऐसा नही है की जिनके हाथ में सत्ता होती वह कुछ करना ही नही चाहते। सारे तो नहीं लेकिन फ़िर भी कुछ नेता सच में ऐसे होतें हैं जो जनता के हित में काम करना चाहते हैं लेकिन समस्या यह है की वह इस पुरे तंत्र को चाह कर भी नही बदल सकतें। इसलिए इस पुरे तंत्र को तभी बदला जा सकता है जब सरकारी तंत्र को इस बात का भाईकी अगर हमने अपना काम सही तरीके से और इमानदारी से नहीं किया तो हमें नोकरी से निकाला भी जा सकता है। सरकारी नोकरी से लोग निश्चिंत हो जातें हैं की अब उन्हें कोई नहीं निकाल सकता। अरे ऐसे कैसे कोई निश्चिंत कर दिया जा सकता है? कब तक हम सरकार के नाम पर बस पार्टियां ही बदलते रहेंगे? कुछ तो ऐसा हो जिससे लगे की हाँ हमने सही व्यक्ति को अपना वोट दिया है।जिसके आने से व्यवस्थाओं में सुधार आय । मेरी राय में जिस तरह जनता को अपने नेता को बदलने का अधिकार देर से ही सही लेकिन दिया ही जाता है उसी तरह प्रत्येक सरकारी तंत्र में भी जनता को ऐसा ही अधिकार होना चाहिए । यदि कोई सरकारी स्कूल , अस्पताल , पुलिस स्टेसन या फ़िर कोई भी सरकारी कार्यालय का अधिकारी या कर्मचारी अपने काम को करने से मन करें , जनता के साथ ग़लत बर्ताव करें या फ़िर रिश्वत मांगें तो उसको जनशिकायत के आधार पर तुंरत निकाला जाना चाहिए। इसलिए जनता की सरकार जनता के द्वारा ही चलाई जाय तभी वह आमजन की सरकार कह्लाय्गी अर्थात सरकार ऐसी हो जो अमीरों से लेकर गरीबो तक की पहुँच में हो।

(गौड़संस टाईम्स में प्रकाशित )

Sunday, 12 April 2009



Saturday, April 11, 2009

कितने हितकारी होंगे ग्राम न्यायलय
प्रीति पाण्डेय /दिल्ली


ग्राम न्यायलय बिल के द्वारा देश भर में करीब 3000 हजार ग्राम न्यायालय स्थापित करने की घोषणा हाल ही में केन्द्रीय मंत्री हंसराज भारद्वाज ने की है। क्या सच में यह बिल गांवों में सुख-शांति का बीज बो पाएगा? गांवों की न्यायिक व्यवस्था की बात चलती है तो `जिसकी लाठी, उसकी भैंस´ की कहावत अनायास ही ध्यान में आ जाती है। ऐसे में गरीब एवं पिछड़े ग्रामीणों को तो दबंगों के सामने आत्मसर्पण करना ही पड़ता है। 2007 में संसद में ग्राम न्यायलय का प्रस्ताव रखा गया, जिसे जनवरी 2009 में मंजूरी दी गईं। कानून पैसे वाले का होता है, सबके मन में पलने वाली इस धारणा पर ग्राम न्यायालय की संकल्पना क्या आशा की नई किरणा जान पड़ती है? क्या है जानकारों की राय और ग्राम न्यायलय गावों के लिए कितने हितकारी होंगे? आईये जानें...
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डॉ युधिष्ठिर शर्मा, न्यायधीश-जिला न्यायालय, गाजियाबाद `ग्राम न्यायलय योजना´ सरकार द्वारा उठाया गया एक बहुत ही अच्छा कदम है। इससे ग्राम स्तर पर बढ़ रहे अपराधिक मामलों को यकीनन लगाम लगाया जा सकता है। गांवों के लोग अक्सर अन्याय सहते रहते हैं चूंकि उनकी नजर में न्याय का मतलब सालों-साल न्यायलय के चक्कर लगाने पर भी न्याय न मिलने से ही है। पहले गांव के कुछ पंच मिलकर पंचायत बैठाते थे जिसमें न्याय दिया जाता था लेकिन धीरे-धीरे इसका असर कम हो गया क्योंकि ग्राम पंचायतों पर से लोगों का विश्वास कम होता जा रहा था। और लोग न्यायलयों पर भरोसा करने लगे। इसलिए ग्राम न्यायलय का खुलना गांव वासियों को उनके अधिकार के प्रति न्याय दिलाने में एक यंत्र का काम कर सकता है। इससे तीन तरह के लाभ होंगे
1। लोगों को उनके घर पर जाकर न्याय दिया जाएगा यानि जसटिस ऑन वील , जसटिस ऑन डोर:- ग्राम न्यायलय की योजना के अन्तर्गत इस बात का खास ध्यान रखा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए न्याय उसके द्वार पर पहुंचे और एक से दो सुनवाई मेंं ही उसे न्याय मिले ।
।2। इस व्यवस्था से सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें न्याय मांगने वाले व्यक्ति का खर्चा कम से कम हो। सीमित साधनों के चलते गांव के लोग आर्थिक तौर पर काफी पिछड़े होते हैं इसीलिए वह न्याय के लिए दस्तक नहीं कर पाते लेकिन ग्राम न्यायलय के द्वारा अब वह कम से कम खर्चे पर न्याय प्राप्त कर सकते हैं। यहां तक की यदि किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिती बहुत ज्यादा खराब है तो सरकार स्वयं उसे सरकारी वकील मुहैया कराएगी और उसका सारा खर्चा सरकार द्वारा ही वहन किया जाएगा। 3। ग्राम न्यायलय का तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण लाभ है कि इस व्यवस्था के अन्र्तगत न्याय की गति काफी तीव्र है। गांव के लोगों को न्याय मिलने में सालों नहीं लगेगे बल्कि उन्हें 6 माह के अन्दर ही यानि एक से दो सुनवाई में ही न्याय मिल जाएगा। इस प्रकार ग्राम न्यायलय एक ऐसी खुली अदालत होगी जिसमें प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह कितना ही गरीब क्यों न हो, वह भी न्याय मांगने के लिए जज के सामने खड़ा हो सकता है। वरना आमतौर पर व्यक्ति को अपनी बात जज तक पहुंचाने का मौका ही नहीं मिल पाता। इसलिए यकीनन इस व्यवस्था से गांव के लोगों को बहुत लाभ होगा और उनके छोटे-मोटे मामले गांव में ही सुलझ जाएंगे।
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मनीष सिसोदिया, सामाजिक कार्यकर्ता (गैर सरकारी संस्था कबीर से सम्बद्ध)
सरकार द्वारा चलाई गई प्रत्येक योजना सफल ही हो ऐसा जरूरी नहीं है। योजनाएं तो लाखों हैं लेकिन उनमें से नाममात्र ही ऐसी होती हैं जो अपने उद्देश्य को पूरा कर पाती हैं। ग्राम न्यायलय बहुत प्रभावित होगा यह कहना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल है, हाँ ग्राम न्यायलय गांव के लिए काफी प्रभावित हो सकता है इस बात में कोई अंदेशा नहीं है बशर्ते व्यवस्था सुव्यवस्थित ढंग से की जाएं तो। गांवों के आपसी झगड़ों को गांव के अन्दर ही सुलझाना बरसों से चली आ रही परंपरा रही है। जिसमें ग्राम पंचायत के आधार पर न्याय किया जाता था। यहां तक कि अंग्रेजों ने भी भारतीय ग्राम पंचायत को भारत की रीढ़ की हड्डी कहा है। ग्राम पंचायते जिन्हें पहले सरकार द्वारा मान्यता होती थी कि वह बिना किसी का पक्ष लिए बिना ही निष्पक्ष होकर न्याय करती थी। लेकिन समय के साथ-साथ ग्राम पंचायतों की मान्यता समाप्त होती गई क्योंकि लोगों का इनपर से विश्वास ही उठ गया था। लेकिन सरकार ने ग्राम न्यायलय को भी ग्राम पंचायत के आधार पर ही बनाया है। मेरा मानना है कि एक या दो व्यक्ति को न्यायलय की बागडोर देने से न्यायलय असल में न्याय ही देगा यह कहना थोड़ा मुश्किल है। उस व्यवस्था में जब तक समाज की भागीदारी नहीं और पारदर्शिता नहीं होगी तब तक लोगों को शुद्ध न्याय नहीं मिल सकता । भारी पक्ष से कमजोर पक्ष को दबना ही पडेगा। ग्राम न्यायलय में भागीदार जज और वकील अन्य वकील और जज की तरह रिश्वत नहीं लेते हों इसकी क्या गारंटी? आए-दिन घूसखोरी के मामले सामने आते हैं जिन्हें देखते हुए किस पर भरोसा किया जाए और किस पर नहीं यह कहना थोड़ा मुश्किल है। इसलिए जहां तक मैं समझता हूं ग्राम न्यायलय में ग्राम सभा को ही यह अधिकार दिया जाए कि वह अपने पूरे गांव में से किसी पढ़े-लिखे और समझदार व्यक्ति जिस पर पूरा गांव भरोसा करता हो, उसे ही अपना जज चुनें और ग्राम न्यायलय के द्वारा उस चुने गए जज और पूरे गांव की सहमती के आधार पर ही फैसला हो। यह एक खुला न्यायलय होना चाहिए जहां पूरे जन-समुदाय के सामने मुद्दा रखा जाए और लोगों की राय भी जाननी जाए की उनकी नजर में कौन गलत और कौन सही है। जिस प्रकार भारत जैसे लोकतंत्र देश में जनता से, जनता द्वारा और जनता के लिए नेता को चुना जाता है। उसी प्रकार गांव से गांव द्वारा और गांव के लिए- के आधार पर न्याय किया जाए तो ज्यादा बेहतर रहेगा। एक व्यक्ति को पावर देना गलत है। अपने गांव को और अपने गांव की समस्याओं को जितने अच्छे तरीके से गांव का व्यक्ति सुलझा सकता है, उतना बाहर से आए या सरकार द्वारा भेजे गए जज नहीं।
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शांति भूषण वरिष्ठ अधिवक्ता, उच्चतम न्यायालय
ग्राम न्यायलय एक बहुत ही अच्छी योजना है जो यकीनन सफल होगी। यह सरकार द्वारा उठाया गया एक प्रशंसनीय कार्य है जिसका परिणाम बहुत प्रभावशाली होगा और गांव में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को राहत पहुंचाएगा। जहां पहले गांव वाले अपने अधिकारों और अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाने से डरते थे वहीं वह अब स्वयं न्यायधीश के सामने अपनी बात रख सकते हैं। जहां कोई उनके बीच में बात काटने वाला नहीं होगा। दोनों पक्षों को अपनी-अपनी बात न्यायधीश के सामने रखने का पूरा-पूरा समय मिलेगा। न्यायधीश भी दोनों पक्षों के प्रत्येक पहलू पर नजर रखते हुए ही और सच्चाई की जड़ तक पहुंचने के बाद ही न्याय करेगा। इस व्यवस्था में वकील का कोई रोल नहीं होगा यहां न्याय देने वाला और न्याय मांगने वाले की डारेक्ट बात होगी। यह ऐसा मोबाइल कोर्ट होगा जिसमें पूरा जन-समुदाय मौजूद होगा और खुले मंच के तौर पर न्याय दिया जाएगा। मेरा मानना है प्रत्येक योजना तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक वहां का नागरिक उस योजना का सफल न बनाएं। ग्राम न्यायलय से आने वाले समय में गांव काफी हद तक अपराध मुक्त हो जाएंगे। क्योंकि जहां न्याय की गति इतनी तेज होगी वहां अपराध कैसे ठहर सकता है। अपनी बात को खत्म करते हुए मैं यही कहुंगा कि ग्राम न्यायलय के आने से गांवों का बहुत जल्दी विकास होगा चूंकि जहां की न्यायिक व्यवस्था ठीक होती है वहां विकास का होना तय है।
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रामबहादुर राय , सम्पादक -प्रथमप्रवाक्ता
ग्राम न्यायलय का बिल पास हुआ है यह एक अच्छी बात है बशतेZ इसे पास करने के पीछे अच्छी मंशा भी हो। यह फैसला सही दिशा में हो तो यकीनन इसका परिणाम सकारात्मक ही होगा लेकिन सरकार की परिक्षा तो तब होगी जब चुनाव हो चुके होंगे। तब असली काम नजर आता है। जहां तक मुझे लगता है अभी तक जहां भी न्याय की बात होती है वहां न्याय के नाम पर निर्णय किए जाते हैं इसलिए किसी जगह के लिए न्यायलय व्यवस्था देने से ज्यादा जरूरी है न्याय प्रणाली में सुधार! इन बिलों को पास करके प्रत्येक सरकार यह साबित करना चाहती है कि वह कितनी गरीबप्रस्त है फिर भले ही उनके चुनावी घोषणा पत्र में गरीब का जिक्र तक न किया गया हो। जो गरीब भूखे पेट सो रहा है उसे कोई क्या न्याय की जरूरत है उसके लिए तो पहला न्याय उसके पेट को भरना है। गरीब अपनी मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर पाए यही उसका पहला न्याय है, बाकी तो बाद की बातें हैं। ग्राम न्यायलय पूरी तरह ग्राम पंचायत के आधार पर हों जिनमें गांव की बात गंाव में ही खत्म हों और जिसमें कोई मुकदमेंबाजी न हो। चूंकि जहां सरकार जुड़ती है वहां अनेक औपचारिकताएं होती है जिन्हें पूरा करने के लिए अक्सर रिश्वत के देवताओं को चढ़ावा चढ़ाना होता है। इसलिए ग्राम न्यायलय में किसी जज और वकील के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए तभी न्याय के लिए रिश्वत का चलन समाप्त हो पाएगा। योजना अच्छी है लेकिन इसका सकारात्मक असर तभी होगा जब इसे अच्छे ढंग से चलाया जाए। (साभार :सोपान स्टेप)